शुक्रवार, 19 जून 2009

जब सही नहीं है साजो सामान तो कैसे जंग लड़ेंगे जवान

Jun 18, 02:07 am
चित्रकूट। जब साजोसामान ही नहीं तो भला खतरनाक डाकुओं से मुकाबला कैसा? जी हां, दो आईपीएस अधिकारियों के गंभीर रूप से जख्मी, तीन जवानों के शहीद होने व चार-पांच लोगों के जख्मी होकर अस्पताल पहुंचने की कहानी तो यही बयान करती है। पुलिस के जवानों की जबानी खतरनाक डकैतों के इस जिले में जिला पुलिस क्या, प्रदेश की सबसे तेज और सटीक कार्रवाई की मास्टर माने जानेवाली एसटीएफ के पास वे साजो सामान व आयुध ही नही हैं, जिनकी बदौलत बिगड़े हालात में जंग जीती जा सके।
सूत्र बताते हैं इस ऑपरेशन में लगभग पांच सौ से ऊपर जवान लगाये गए थे, जिसमें कुल पचास के पास ही बुलेटपू्रफ जैकेट थी। आयुधों के हाल यह थे कि जिला पुलिस के तमाम जवान घटनास्थल के बाहर मन मसोसकर सिर्फ इसलिए खड़े थे क्योंकि उनके असलहे गोली चलाने में सक्षम नहीं थे। एटीएफ के जवान जहां अपने एडीशनल एसपी के घायल होने के बाद मोर्चे पर डटे होने और साथियों के घायल होने के कारण उच्चाधिकारियों की अदूरदर्शितापूर्ण कार्यवाही पर झुंझलाहट से भरे नजर आ रहे थे।
तमाम एटीटीएफ जवान इस बात को लेकर तीखी प्रतिक्रिया भी व्यक्त कर रहे थे कि उन्हें क्विक मार्च का हुक्म तो दिया पर यहां की पूरी स्थिति बताने की जरूरत नहीं समझी। वे कह रहे थे जहां पर ड्रैगनलाइट, डायनामाइट व लॉन्चर की जरूरत थी, वे केवल अपने वेपन को लेकर ही आये। कहा कि अगर मौका दिया होता तो यह कार्रवाई केवल पांच घंटों में निपट जाती। एक अकेले डाकू द्वारा लगातार दो दिनों तक इस तरह मामले को लटकाये रखने को लेकर जिला पुलिस के लोग भी काफी नाराज थे। उनका कहना था कि अगर उनके पास सही वेपन होते तो वे ही डाकू नान उर्फ घनश्याम केवट को कब का ढ़ेर कर चुके होते।

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