Jul 03, 10:44 pm
चित्रकूट। 'हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा।' पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई की ये पंक्तियां यहां के जवानों को अब एक बार सुनाई जा रही हैं, और सुनाई भी क्यों न जायें जब केवल एक डाकू के कारण चार जवानों को शहीद होना पड़ा और आठ अभी अस्पताल में हैं।
वैसे जिला पुलिस के अधिकतर जवान इस मुठभेड़ के समय अपने वर्षो पुराने साजो सामान के साथ जमौली गांव में महुआ के पेड़ों के नीचे थे या फिर समीपवर्ती गांव की खाटों पर विश्राम कर रहे थे। तमाम के मुंह से तो यह भी निकला था कि 'साहब इन जंग लगी एसएलआर से हमसे डाकू मरवाओगे।' लेकिन इन सब बातों से इतर अपर पुलिस अधीक्षक जुगुल किशोर ने जवानों के अंदर आत्मविश्वास भरने का काम शुरू कर रखा है। बी पी मोबाइल मोर्चा की खूबियों से परिचित कराकर उनके अंदर डाकुओं से लड़ने का हौसला भरा जाने लगा है। उन्होंने बताया कि खुले में एम्बुश लगाने के समय बुलेटप्रूफ मोर्चा आड़ का काम करेगा। इसके साथ ही जिले में पहली बार बुलेटप्रूफ पटका भी आ चुका है। यह जवानों के सिर की रक्षा करेगा।
आपरेशन डाकू नान केवट ! सांसत भरे 51 घंटे ! ! ! !
आखिर अब तो चेत जाओ हमारे जांबाजो, एक डाकू को मारने के लिये इतनी बडी फौज। फिर भी मरने के बाद कर डाली थी गोलियों की बरसात
शनिवार, 4 जुलाई 2009
उतरते ही मोर्चा लेने वाली जगह पर पहुंचे एडीजी
Jul 02, 10:46 pm
चित्रकूट। पिछली बार जब एडीजी बृजलाल राजापुर थाने के गांव जमौली में आये थे तो स्थिति विषम थी। गांव में उतरते ही उन्हें बुलेटप्रूफ जैकेट के साथ एके 56 की आवश्यकता पड़ी थी और रात भर वहीं पर डेरा डालने के साथ गोलियां भी चलानी पड़ी थीं। दोबारा गांव आकर वह सबसे पहले उस स्थान पर गये जहां उन्होंने दस्यु नान पर ग्रेनेड फेंकने के साथ ही गोलियां दागी थीं।
जमौली में कार से उतरते ही साथ एडीजी बृजलाल के सामने सबसे पहले सिपाही शेखर शर्मा आ गया। तुरन्त ही उन्होंने उसकी पीठ ठोंककर शाबाशी दी। बैठकर बात करने के पहले ही डीजी पीएसी पीपीएस सिद्धू बोल पड़े कि पहले गांव घूम लिया जाये। बातें बाद में होंगी तो वे सबसे पहले उन्हें लेकर उस घर के सामने पहुंचे जहां से उन्होंने डाकू से लगभग इक्कीस घंटे मोर्चा लिया था। उन्होंने डीजी को बताया कि उन्होंने यहां से ग्रेनेड फेंका था। बाद में उन्होंने पूरे गांव का जायजा भी लिया। इस दौरान एएसपी जुगुल किशोर ने डाकू नान के गांव में आने से लेकर मारे जाने तक की बात बतायी। उनके बताने के तरीके पर प्रसन्न होकर डीजी ने कहा कि अब मुझे विश्वास हुआ कि आप के ही नेतृत्व में पूरा आपरेशन हुआ है। एसपी राकेश प्रधान भी बाद की स्थितियों के बारे में काफी देर तक चर्चा करते रहे।
चित्रकूट। पिछली बार जब एडीजी बृजलाल राजापुर थाने के गांव जमौली में आये थे तो स्थिति विषम थी। गांव में उतरते ही उन्हें बुलेटप्रूफ जैकेट के साथ एके 56 की आवश्यकता पड़ी थी और रात भर वहीं पर डेरा डालने के साथ गोलियां भी चलानी पड़ी थीं। दोबारा गांव आकर वह सबसे पहले उस स्थान पर गये जहां उन्होंने दस्यु नान पर ग्रेनेड फेंकने के साथ ही गोलियां दागी थीं।
जमौली में कार से उतरते ही साथ एडीजी बृजलाल के सामने सबसे पहले सिपाही शेखर शर्मा आ गया। तुरन्त ही उन्होंने उसकी पीठ ठोंककर शाबाशी दी। बैठकर बात करने के पहले ही डीजी पीएसी पीपीएस सिद्धू बोल पड़े कि पहले गांव घूम लिया जाये। बातें बाद में होंगी तो वे सबसे पहले उन्हें लेकर उस घर के सामने पहुंचे जहां से उन्होंने डाकू से लगभग इक्कीस घंटे मोर्चा लिया था। उन्होंने डीजी को बताया कि उन्होंने यहां से ग्रेनेड फेंका था। बाद में उन्होंने पूरे गांव का जायजा भी लिया। इस दौरान एएसपी जुगुल किशोर ने डाकू नान के गांव में आने से लेकर मारे जाने तक की बात बतायी। उनके बताने के तरीके पर प्रसन्न होकर डीजी ने कहा कि अब मुझे विश्वास हुआ कि आप के ही नेतृत्व में पूरा आपरेशन हुआ है। एसपी राकेश प्रधान भी बाद की स्थितियों के बारे में काफी देर तक चर्चा करते रहे।
नुकसान लाखों का मदद एक हजार
Jul 02, 10:33 pm
चित्रकूट। 'भइया सरकार के कर्मचारी चाहै जो कहैं पै हमैं एक हजार रूपया के साथै गल्ला भर मिला है'। यह उनके अल्फाज हैं जो एक डाकू के गांव में घुसने के कारण अपना सब कुछ गंवा चुके हैं। ग्राम जमौली के हर एक घर की कहानी अलग-अलग है, पहले डाकू के कारण पूरा गांव जला दिया गया, फिर राहत के नाम पर कहा तो काफी कुछ गया पर देने की जगह में लेखपाल की आधी-अधूरी और 'खेल' की हुई लिस्ट का सहारा लिया गया। जिसका लाखों से ज्यादा का नुकसान था उसे एक हजार मिला और जिसका नुकसान लाखों में हुआ उसको मिलने की बात तो दूर पीडि़तों की लिस्ट से नाम उड़ा दिया गया।
घटना के समय अपने रिश्तेदार की शादी में जाने वाली जुगराज की पत्नी सुनैना और अमित लाल की पत्नी कुसुम बताती है उन्हें आर्थिक सहायता के नाम पर अभी तक कुल 1000 रुपया नकद ही मिला है। इसमें न तो घर बन सकता है और न ही बर्तन कपड़े ही खरीदे जा सकते हैं। रिश्ते में जेठानी व देवरानी लगने वाली सुनैना व कुसुम बताती है कि घटना के समय वे अपने रिश्तेदार की बेटी की शादी में बाहर थीं बाद में जब आकर देखा तो यहां पर हाल काफी खराब था। ताला बंद घर के न तो किवाड़ सुरक्षित थे और नही घर का कोई भी समान सुरक्षित बचा था। सभी कुछ आग में जल कर खाक हो चुका था। राहत के नाम पर सरकार ने उन्हें एक हजार रुपयों के अलावा दो कुन्टल गेंहू, तीन कुंटल चावल के साथ ही एक साड़ी, एक कंबल व एक गमछा व एक तिरपाल दी है। उन्होंने लेखपाल पर आरोप लगाया कि जिसने भी उसे खुश किया उनको तो पांच हजार दिला दिया पर जो खुश करने में नाकाम रहे उसे पांच हजार नही दिलाये।
चित्रकूट। 'भइया सरकार के कर्मचारी चाहै जो कहैं पै हमैं एक हजार रूपया के साथै गल्ला भर मिला है'। यह उनके अल्फाज हैं जो एक डाकू के गांव में घुसने के कारण अपना सब कुछ गंवा चुके हैं। ग्राम जमौली के हर एक घर की कहानी अलग-अलग है, पहले डाकू के कारण पूरा गांव जला दिया गया, फिर राहत के नाम पर कहा तो काफी कुछ गया पर देने की जगह में लेखपाल की आधी-अधूरी और 'खेल' की हुई लिस्ट का सहारा लिया गया। जिसका लाखों से ज्यादा का नुकसान था उसे एक हजार मिला और जिसका नुकसान लाखों में हुआ उसको मिलने की बात तो दूर पीडि़तों की लिस्ट से नाम उड़ा दिया गया।
घटना के समय अपने रिश्तेदार की शादी में जाने वाली जुगराज की पत्नी सुनैना और अमित लाल की पत्नी कुसुम बताती है उन्हें आर्थिक सहायता के नाम पर अभी तक कुल 1000 रुपया नकद ही मिला है। इसमें न तो घर बन सकता है और न ही बर्तन कपड़े ही खरीदे जा सकते हैं। रिश्ते में जेठानी व देवरानी लगने वाली सुनैना व कुसुम बताती है कि घटना के समय वे अपने रिश्तेदार की बेटी की शादी में बाहर थीं बाद में जब आकर देखा तो यहां पर हाल काफी खराब था। ताला बंद घर के न तो किवाड़ सुरक्षित थे और नही घर का कोई भी समान सुरक्षित बचा था। सभी कुछ आग में जल कर खाक हो चुका था। राहत के नाम पर सरकार ने उन्हें एक हजार रुपयों के अलावा दो कुन्टल गेंहू, तीन कुंटल चावल के साथ ही एक साड़ी, एक कंबल व एक गमछा व एक तिरपाल दी है। उन्होंने लेखपाल पर आरोप लगाया कि जिसने भी उसे खुश किया उनको तो पांच हजार दिला दिया पर जो खुश करने में नाकाम रहे उसे पांच हजार नही दिलाये।
बालिका के सवालों से चकराये अधिकारी
Jul 02, 10:33 pm
चित्रकूट। जहां एक तरफ गांव वाले एडीजी और डीजी पीएसी के सामने कुछ भी बोलने से डर रहे थे वहीं एक लड़की ने अपने सवालों से पुलिस अधिकारियों के मुंह बंद कर दिये।
अपने ननिहाल जमौली आयी लुधियाना की रहने वाली राधा ने सीधे डीजी पीएसी पीपीएस सिद्धू व एडीजी कानून व्यवस्था बृजलाल के सामने पहुंचकर गांव के हालात के बारे में जानकारी देकर कहा कि गांव में डाकू घुस आया। पुलिस ने उसे मारने के लिए पूरा गांव जला दिया अब राहत के नाम पर क्यों कन्नी काटी जा रही है। जितना भी सामान जला उसका पूरा मुआवजा देने के साथ ही डाकुओं के संरक्षणदाता के नाम पर ग्रामीणों को परेशान न किया जाये। उसके पूछे जाने वाले तीखे सवालों से पुलिस के दोनो शीर्षस्थ अधिकारियों के साथ ही एसपी और एएसपी भी सकते में आ गये। दोनों अधिकारियों से बार-बार बालिका के सवाल पूछे जाने पर उनके पास केवल एक उत्तर था कि राहत का मामला उनका नहीं है। इसके लिए जिला प्रशासन ही कुछ कर सकेगा। बालिका का तर्क था कि आग पुलिस ने लगाई है तो राहत के लिए उन्हें ही प्रयास करना चाहिये। काफी देर बाद उसके साथ आयी गांव की राजबेटी, तारा देवी, मेड़िया देवी, रामवती आदि ने लोगों का हस्ताक्षर युक्त पत्र पुलिस अधीक्षक को सौंपा। पत्र में गुहार लगायी है कि दस्यु को संरक्षण देने के नाम पर ग्रामीणों को बेवजह परेशान न किया जाये।
चित्रकूट। जहां एक तरफ गांव वाले एडीजी और डीजी पीएसी के सामने कुछ भी बोलने से डर रहे थे वहीं एक लड़की ने अपने सवालों से पुलिस अधिकारियों के मुंह बंद कर दिये।
अपने ननिहाल जमौली आयी लुधियाना की रहने वाली राधा ने सीधे डीजी पीएसी पीपीएस सिद्धू व एडीजी कानून व्यवस्था बृजलाल के सामने पहुंचकर गांव के हालात के बारे में जानकारी देकर कहा कि गांव में डाकू घुस आया। पुलिस ने उसे मारने के लिए पूरा गांव जला दिया अब राहत के नाम पर क्यों कन्नी काटी जा रही है। जितना भी सामान जला उसका पूरा मुआवजा देने के साथ ही डाकुओं के संरक्षणदाता के नाम पर ग्रामीणों को परेशान न किया जाये। उसके पूछे जाने वाले तीखे सवालों से पुलिस के दोनो शीर्षस्थ अधिकारियों के साथ ही एसपी और एएसपी भी सकते में आ गये। दोनों अधिकारियों से बार-बार बालिका के सवाल पूछे जाने पर उनके पास केवल एक उत्तर था कि राहत का मामला उनका नहीं है। इसके लिए जिला प्रशासन ही कुछ कर सकेगा। बालिका का तर्क था कि आग पुलिस ने लगाई है तो राहत के लिए उन्हें ही प्रयास करना चाहिये। काफी देर बाद उसके साथ आयी गांव की राजबेटी, तारा देवी, मेड़िया देवी, रामवती आदि ने लोगों का हस्ताक्षर युक्त पत्र पुलिस अधीक्षक को सौंपा। पत्र में गुहार लगायी है कि दस्यु को संरक्षण देने के नाम पर ग्रामीणों को बेवजह परेशान न किया जाये।
दीवारें कच्ची होने से लंबी चली नान से मुठभेड़
Jul 02, 10:32 pm
चित्रकूट। डाकू घनश्याम केवट से 51 घंटे मुठभेड़ के कारण जानने कभी यहां एसपी रहे डीजी पीएसी पीपीएस सिद्धू को लेकर एडीजी बृजलाल जमौली गांव पहुंचे। दोनों अधिकारियों ने गांव की हर उस जगह को देखा, जहां दस्यु नान ने पुलिस से मोर्चा लिया था। डीजी पीएसी ने खुद कई स्थानों की फोटोग्राफी भी की।
डीजी पीएसी ने गांव भ्रमण के बाद पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि वे यहां पर सबक लेने आये हैं कि कभी इस तरह की समस्या दोबारा उत्पन्न हो जाए तो उससे निपटने के लिए सुरक्षित रणनीति क्या हो। गांव की भौगोलिक परिस्थिति को देखकर कहा कि मिट्टी की दीवारों में गोली प्रभावी ढंग से काम नही कर सकती थी और खपरैल के मकानों में आग ने भी डाकू को ज्यादा क्षति नही पहुंचाई। इसके कारण ही इस डाकू को मारने में ज्यादा समय लगा। उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाओं में स्थानीय पुलिस ज्यादा प्रभावी ढंग से काम करती है। यह पूछे जाने पर कि जब डाकू छत से कूदकर भाग रहा था तो गोली क्यों नहीं चलायी गई तो उनका जवाब था कि गोली से क्रॉस फायरिंग में हमारे ही जवान या फिर किसी निर्दोष की जान जा सकती थी। उन्होंने डाकू घनश्याम को मारे जाने के पीछे सामूहिक प्रयास की बात पर बल देते हुये कहा कि यह बात और है कि बाद में उसे हमारे कुछ जवानों ने मार गिराया पर इस ऑपरेशन में लगे सभी लोग बधाई के पात्र हैं। घायल सिपाहियों को सहायता राशि दिये जाने की बाबत एडीजी बृजलाल ने कहा कि सात घायलों को तीन-तीन लाख व एक आंशिक घायल को पचास हजार रुपये दिये जाने की जानकारी उन्हें है। उन्होंने दस्यु प्रभावित जिलों में पुलिस के पास संसाधनों की कमी पर बताया कि इस प्रकार के हर जिले में अच्छी मात्रा में पीएसी दी गई है। पुलिस के पास भी पर्याप्त मात्रा में संसाधन हैं। दोनों ने इसके बाद गांव व मुख्यालय के डाक बंगले में अपने अधीनस्थ कर्मियों के साथ बैठक कर आवश्यक निर्देश दिये। साथ ही यहां की भौगोलिक परिस्थितियों के बारे में पूरी जानकारी कर डाकुओं के सफाये की रणनीति में आवश्यक फेरबदल भी किये। एसपी राकेश प्रधान, एएसपी जुगुलकिशोर के साथ एसओजी के जवान मौजूद रहे।
चित्रकूट। डाकू घनश्याम केवट से 51 घंटे मुठभेड़ के कारण जानने कभी यहां एसपी रहे डीजी पीएसी पीपीएस सिद्धू को लेकर एडीजी बृजलाल जमौली गांव पहुंचे। दोनों अधिकारियों ने गांव की हर उस जगह को देखा, जहां दस्यु नान ने पुलिस से मोर्चा लिया था। डीजी पीएसी ने खुद कई स्थानों की फोटोग्राफी भी की।
डीजी पीएसी ने गांव भ्रमण के बाद पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि वे यहां पर सबक लेने आये हैं कि कभी इस तरह की समस्या दोबारा उत्पन्न हो जाए तो उससे निपटने के लिए सुरक्षित रणनीति क्या हो। गांव की भौगोलिक परिस्थिति को देखकर कहा कि मिट्टी की दीवारों में गोली प्रभावी ढंग से काम नही कर सकती थी और खपरैल के मकानों में आग ने भी डाकू को ज्यादा क्षति नही पहुंचाई। इसके कारण ही इस डाकू को मारने में ज्यादा समय लगा। उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाओं में स्थानीय पुलिस ज्यादा प्रभावी ढंग से काम करती है। यह पूछे जाने पर कि जब डाकू छत से कूदकर भाग रहा था तो गोली क्यों नहीं चलायी गई तो उनका जवाब था कि गोली से क्रॉस फायरिंग में हमारे ही जवान या फिर किसी निर्दोष की जान जा सकती थी। उन्होंने डाकू घनश्याम को मारे जाने के पीछे सामूहिक प्रयास की बात पर बल देते हुये कहा कि यह बात और है कि बाद में उसे हमारे कुछ जवानों ने मार गिराया पर इस ऑपरेशन में लगे सभी लोग बधाई के पात्र हैं। घायल सिपाहियों को सहायता राशि दिये जाने की बाबत एडीजी बृजलाल ने कहा कि सात घायलों को तीन-तीन लाख व एक आंशिक घायल को पचास हजार रुपये दिये जाने की जानकारी उन्हें है। उन्होंने दस्यु प्रभावित जिलों में पुलिस के पास संसाधनों की कमी पर बताया कि इस प्रकार के हर जिले में अच्छी मात्रा में पीएसी दी गई है। पुलिस के पास भी पर्याप्त मात्रा में संसाधन हैं। दोनों ने इसके बाद गांव व मुख्यालय के डाक बंगले में अपने अधीनस्थ कर्मियों के साथ बैठक कर आवश्यक निर्देश दिये। साथ ही यहां की भौगोलिक परिस्थितियों के बारे में पूरी जानकारी कर डाकुओं के सफाये की रणनीति में आवश्यक फेरबदल भी किये। एसपी राकेश प्रधान, एएसपी जुगुलकिशोर के साथ एसओजी के जवान मौजूद रहे।
मंगलवार, 23 जून 2009
पीडि़तों को प्रशासन ने राहत दी
Jun 23, 11:37 am
चित्रकूट। डाकू घनश्याम के कारण आग की तपिश से झुलसने वाले जमौली गांव के पीडि़तों को राहत देने का काम प्रशासन के साथ ही रेडक्रास सोसायटी ने किया। जिलाधिकारी ह्देश कुमार के साथ ही सदर विधायक दिनेश मिश्र ने पहुंचकर गांव वालों को जहां एक तरफ मानसिक रुप से मजबूत होने का संदेश दिया वहीं दोबारा अपनी पुरानी जिंदगी पाने के लिये आर्थिक सहायता भी प्रदान की।
आग की लपटों से झुलसे राजस्व कर्मचारियों द्वारा चिन्हित 57 घरों के लोगों को पहली किस्त के रूप में इंदिरा आवास के तहत गृह निर्माण के लिये 26200 रुपये दिये गये। यहां बताया गया कि घरों ंकी जब छत पड़ने का नम्बर आयेगा तो उन्हें 8800 रुपया और दिया जायेगा। इसके साथ ही इन्हीं परिवारों के लिये बर्तन व कपड़ा खरीदने के लिये 5000 रुपये का चेक प्रदान किया गया साथ ही 1000 रुपया पशुओं के चारे के लिये भी दिया गया। इसी अवसर पर जिला रेडक्रास सोसायटी द्वारा एक साड़ी, एक लुंगी और एक कम्बल का वितरण किया गया। जिला मुख्य चिकित्साधिकारी ने भी अपने विभाग की ओर से प्रत्येक परिवार को एक-एक हजार रुपया नकद सहायता राशि दी।
यही पर जमौली गांव में नरेगा के अंतर्गत होने वाले विकास कार्यो के लिये पहली किस्त के रुप में 5.70 हजार का चेक भदेदू प्रधान शिवकलिया को
सौंपा गया। इस योजना के तहत पीडि़त प्रत्येक परिवार के एक व्यक्ति का जाब कार्ड बनाया गया। वैसे विकास कार्यो को 19 जून से प्रारंभ हो चुके हैं। इसके मुख्य काम जमौली गांव के लिये सम्पर्क मार्ग, गांव के अंदर गलियों में खडंजा एवं सीसी रोड़ व नाली के साथ ही तालाब का निर्माण कराया जायेगा।
इसके साथ ही पीडि़त परिवारों के भरण पोषण के लिये 3 कुंटल चावल व 2 कुंटल गेहूं का भी वितरण किया गया।
वैसे इस गांव में 17 जून से ही विस्थापित ग्राम वासियों को तहसील स्तर पर ही निशुल्क भोजन की व्यवस्था कराई जा रही है। उन्हें तीन समय का भोजन दिया जा रहा है। इसके पूर्व जिला रेडक्रास सोसायटी की तरफ से 540 फिट तिरपाल का वितरण किया जा चुका है।
इस अवसर पर सीडीओ पीसी श्रीवास्तव, एसडीएम ह्षीकेश भास्कर यशोद, तहसीलदार अश्विनी कुमार श्रीवास्तव आदि अधिकारी मौजूद रहे।
नही मिल सकी इन्हें राहत
इनके घर तो जल गये पर ये गांव में नही रहते। सूखे की विभीषिका और कम आमदनी में पेट न भरने के कारण बाहर चला जाना इन्हें मंहगा पड़ गया। राजस्व कर्मचारियों ने अपनी बनाई लिस्ट में इनके मकान जलने के बाद भी जगह नही दी। राजेश पुत्र जगन्नाथ गांव में पेट न भरने के कारण प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रिक्शा चलाता है व राजेन्द्र कुमार पुत्र जगन्नाथ दिल्ली में रहकर दिहाड़ी मजदूर हैं पर दोनो का नाम लिस्ट से गायब था। लिहाजा ये सहायता पाने से वंचित रह गये। इसके साथ ही बारह नाम ऐसे हैं जिनके मकान गांव में हैं और वे आग लगने के दौरान गांव से बाहर थे। इनका भी सब कुछ आग से राख हो गया पर लेखपाल की कृपादृष्टि इन पर नही पड़ी। गजोधर पुत्र जगमोहन, काशी प्रसाद पुत्र प्रभुदयाल, राजू पुत्र राम प्रसाद, मोती लाल पुत्र बोदा, भालेन्द्र पुत्र गया प्रसाद, दुजिया पत्नी धर्मपाल, राजकुमार पुत्र राम प्रसाद, दिनेश कुमार पुत्र राम प्रसाद, रमेश कुमार पुत्र ज्ञान पाल ने बताया कि वे लोग गांव में ही रहकर मजदूरी करते हैं, पर लेखपाल ने उनका नाम पीडि़तों की लिस्ट में नही दिया। जबकि उनके मकान भी पूरी तौर पर जल गये हैं। सोमवार को भी वे अपने प्रार्थना पत्र लिये टहलते रहे पर राजस्व कर्मियों ने उन्हें बैंरग वापस भेजने के साथ ही मुख्य सभा स्थल से दूर ही रखा।
चित्रकूट। डाकू घनश्याम के कारण आग की तपिश से झुलसने वाले जमौली गांव के पीडि़तों को राहत देने का काम प्रशासन के साथ ही रेडक्रास सोसायटी ने किया। जिलाधिकारी ह्देश कुमार के साथ ही सदर विधायक दिनेश मिश्र ने पहुंचकर गांव वालों को जहां एक तरफ मानसिक रुप से मजबूत होने का संदेश दिया वहीं दोबारा अपनी पुरानी जिंदगी पाने के लिये आर्थिक सहायता भी प्रदान की।
आग की लपटों से झुलसे राजस्व कर्मचारियों द्वारा चिन्हित 57 घरों के लोगों को पहली किस्त के रूप में इंदिरा आवास के तहत गृह निर्माण के लिये 26200 रुपये दिये गये। यहां बताया गया कि घरों ंकी जब छत पड़ने का नम्बर आयेगा तो उन्हें 8800 रुपया और दिया जायेगा। इसके साथ ही इन्हीं परिवारों के लिये बर्तन व कपड़ा खरीदने के लिये 5000 रुपये का चेक प्रदान किया गया साथ ही 1000 रुपया पशुओं के चारे के लिये भी दिया गया। इसी अवसर पर जिला रेडक्रास सोसायटी द्वारा एक साड़ी, एक लुंगी और एक कम्बल का वितरण किया गया। जिला मुख्य चिकित्साधिकारी ने भी अपने विभाग की ओर से प्रत्येक परिवार को एक-एक हजार रुपया नकद सहायता राशि दी।
यही पर जमौली गांव में नरेगा के अंतर्गत होने वाले विकास कार्यो के लिये पहली किस्त के रुप में 5.70 हजार का चेक भदेदू प्रधान शिवकलिया को
सौंपा गया। इस योजना के तहत पीडि़त प्रत्येक परिवार के एक व्यक्ति का जाब कार्ड बनाया गया। वैसे विकास कार्यो को 19 जून से प्रारंभ हो चुके हैं। इसके मुख्य काम जमौली गांव के लिये सम्पर्क मार्ग, गांव के अंदर गलियों में खडंजा एवं सीसी रोड़ व नाली के साथ ही तालाब का निर्माण कराया जायेगा।
इसके साथ ही पीडि़त परिवारों के भरण पोषण के लिये 3 कुंटल चावल व 2 कुंटल गेहूं का भी वितरण किया गया।
वैसे इस गांव में 17 जून से ही विस्थापित ग्राम वासियों को तहसील स्तर पर ही निशुल्क भोजन की व्यवस्था कराई जा रही है। उन्हें तीन समय का भोजन दिया जा रहा है। इसके पूर्व जिला रेडक्रास सोसायटी की तरफ से 540 फिट तिरपाल का वितरण किया जा चुका है।
इस अवसर पर सीडीओ पीसी श्रीवास्तव, एसडीएम ह्षीकेश भास्कर यशोद, तहसीलदार अश्विनी कुमार श्रीवास्तव आदि अधिकारी मौजूद रहे।
नही मिल सकी इन्हें राहत
इनके घर तो जल गये पर ये गांव में नही रहते। सूखे की विभीषिका और कम आमदनी में पेट न भरने के कारण बाहर चला जाना इन्हें मंहगा पड़ गया। राजस्व कर्मचारियों ने अपनी बनाई लिस्ट में इनके मकान जलने के बाद भी जगह नही दी। राजेश पुत्र जगन्नाथ गांव में पेट न भरने के कारण प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रिक्शा चलाता है व राजेन्द्र कुमार पुत्र जगन्नाथ दिल्ली में रहकर दिहाड़ी मजदूर हैं पर दोनो का नाम लिस्ट से गायब था। लिहाजा ये सहायता पाने से वंचित रह गये। इसके साथ ही बारह नाम ऐसे हैं जिनके मकान गांव में हैं और वे आग लगने के दौरान गांव से बाहर थे। इनका भी सब कुछ आग से राख हो गया पर लेखपाल की कृपादृष्टि इन पर नही पड़ी। गजोधर पुत्र जगमोहन, काशी प्रसाद पुत्र प्रभुदयाल, राजू पुत्र राम प्रसाद, मोती लाल पुत्र बोदा, भालेन्द्र पुत्र गया प्रसाद, दुजिया पत्नी धर्मपाल, राजकुमार पुत्र राम प्रसाद, दिनेश कुमार पुत्र राम प्रसाद, रमेश कुमार पुत्र ज्ञान पाल ने बताया कि वे लोग गांव में ही रहकर मजदूरी करते हैं, पर लेखपाल ने उनका नाम पीडि़तों की लिस्ट में नही दिया। जबकि उनके मकान भी पूरी तौर पर जल गये हैं। सोमवार को भी वे अपने प्रार्थना पत्र लिये टहलते रहे पर राजस्व कर्मियों ने उन्हें बैंरग वापस भेजने के साथ ही मुख्य सभा स्थल से दूर ही रखा।
न कोई बंकर और न था कहीं घोड़ा
Jun 23, 11:37 am
चित्रकूट। डाकू घनश्याम केवट के कारण चर्चा में आये जमौली गांव के लोग आज भी आंख में आंसू लिये हर एक से सवाल पूछते हैं कि भइया हमारा कसूर क्या है। बच्चे के जन्म में खुशियां मनाना गलत होता है क्या। अब जब बीहड़ में रहेंगे तो हमारे लिए डाकू क्या और पुलिस क्या, जो भी बंदूक के जोर पर खाना मांगेगा उसे तो देना ही पड़ेगा। अब ऐसे में डाकू का शरणदाता बता उत्पीड़न का भय दिखाया जाना तो गलत ही है।
जमौली गांव के श्याम सुन्दर, राम राज, फूलचंद्र, जगन्नाथ, रामजस , महेश, बाबू लाल, भैंरोदीन व महावीर आदि दर्जनों लोग कहते हैं कि गांव में कोहराम मचा था। डाकू को निकालने के लिए उनकी आंखों के सामने पूरा गांव जला दिया गया और अब यह बदनामी कि गांव वाले डाकू को शरण देते थे। उन्होंने बताया कि गांव के मकान अन्य गांवों जैसे ही साधारण बने हैं। एक दूसरे मकान से न कोई मकान जुड़ा है और न ही किसी मकान के अंदर गड्ढा या बंकर है। उन्होंने बताया कि गांव के लोगों को जातिगत कारणों से डाकू को पनाह देना भी गलत है। गांव के मकानों के अंदर बंकर और डाकू के भागने के स्थान से कुछ दूरी पर घोड़ा होने की बात को तो पुलिस उपाधीक्षक नगर आलोक जायसवाल ने भी सिरे से नकार दिया। कहा कि चंबल के डाकुओं के पास कभी घोड़े हुआ करते थे। फिर डाकू घनश्याम का पारिवारिक ऐसा परिवेश भी नही है कि उसके पास कभी घोड़ा रहा हो तो फिर उसकी सहायता करने के लिए घोड़ा कहां से आया। उधर मुठभेड़ के समय किसकी हिम्मत थी कि वह अपनी जान जोखिम में डाल डाकू की मदद करने आयेगा। एसटीएफ के दर्जनों जवान जिन्होंने लगातार तीस घंटों तक दस्यु नान को मारने के लिए अथक परिश्रम किया बताते हैं कि न तो डाकू के मरने के बाद कोई मोबाइल मिला और न ही सर्विलांस पर ऐसा कुछ देखा गया। बंकर, घोड़ा और मोबाइल का उपयोग करने वाली बातें गलत हैं।
चित्रकूट। डाकू घनश्याम केवट के कारण चर्चा में आये जमौली गांव के लोग आज भी आंख में आंसू लिये हर एक से सवाल पूछते हैं कि भइया हमारा कसूर क्या है। बच्चे के जन्म में खुशियां मनाना गलत होता है क्या। अब जब बीहड़ में रहेंगे तो हमारे लिए डाकू क्या और पुलिस क्या, जो भी बंदूक के जोर पर खाना मांगेगा उसे तो देना ही पड़ेगा। अब ऐसे में डाकू का शरणदाता बता उत्पीड़न का भय दिखाया जाना तो गलत ही है।
जमौली गांव के श्याम सुन्दर, राम राज, फूलचंद्र, जगन्नाथ, रामजस , महेश, बाबू लाल, भैंरोदीन व महावीर आदि दर्जनों लोग कहते हैं कि गांव में कोहराम मचा था। डाकू को निकालने के लिए उनकी आंखों के सामने पूरा गांव जला दिया गया और अब यह बदनामी कि गांव वाले डाकू को शरण देते थे। उन्होंने बताया कि गांव के मकान अन्य गांवों जैसे ही साधारण बने हैं। एक दूसरे मकान से न कोई मकान जुड़ा है और न ही किसी मकान के अंदर गड्ढा या बंकर है। उन्होंने बताया कि गांव के लोगों को जातिगत कारणों से डाकू को पनाह देना भी गलत है। गांव के मकानों के अंदर बंकर और डाकू के भागने के स्थान से कुछ दूरी पर घोड़ा होने की बात को तो पुलिस उपाधीक्षक नगर आलोक जायसवाल ने भी सिरे से नकार दिया। कहा कि चंबल के डाकुओं के पास कभी घोड़े हुआ करते थे। फिर डाकू घनश्याम का पारिवारिक ऐसा परिवेश भी नही है कि उसके पास कभी घोड़ा रहा हो तो फिर उसकी सहायता करने के लिए घोड़ा कहां से आया। उधर मुठभेड़ के समय किसकी हिम्मत थी कि वह अपनी जान जोखिम में डाल डाकू की मदद करने आयेगा। एसटीएफ के दर्जनों जवान जिन्होंने लगातार तीस घंटों तक दस्यु नान को मारने के लिए अथक परिश्रम किया बताते हैं कि न तो डाकू के मरने के बाद कोई मोबाइल मिला और न ही सर्विलांस पर ऐसा कुछ देखा गया। बंकर, घोड़ा और मोबाइल का उपयोग करने वाली बातें गलत हैं।
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