रविवार, 21 जून 2009

नान मारा गया लेकिन सवाल अभी बाकी

Jun 20, 01:52 am
चित्रकूट। एक डकैत, पांच सौ प्रशिक्षित जवान, 51 घंटे मुठभेड़, दस घायल और चार जवानों की शहादत। फिर भी डकैत की मौत के बाद उप्र पुलिस खुद की पीठ क्या सोंचकर थपथपा रही है यह बात समझ से परे है। डाकू नान से हुई मुठभेड़ कई अनुत्तरित प्रश्न अपने पीछे छोड़ गयी है जिसका जवाब दे पाना प्रदेश पुलिस के आला अफसरों के लिए शायद बेहद मुश्किल होगा क्योंकि डकैत तो मारा गया लेकिन सवाल अभी बाकी हैं। स्थानीय पुलिस की अपराधों के आगे घुटने टेक देने और अपराधियों से सांठ-गांठ की प्रवृत्ति ने इस क्षेत्र में डकैतों की लंबी विषबेल तैयार कर दी जो दुर्दात डकैतों के मारे जाने के बाद भी लगातार फलती-फूलती रही।
बिना किसी तैयारी और रणनीति के लगातार 51 घंटों तक एक अदने से डाकू ने जिस तरह से साधन संपन्न भारी भरकम पुलिस फोर्स को दांतों तले चने चबवा डाले उससे पूरे पुलिस महकमे पर उंगली उठना स्वाभाविक है। लोगों को शुक्र मनाना चाहिए एसटीएफ का जिसने दुर्दात डकैत ददुआ और ठोकिया को मार कर अमन-चैन से रहने का मौका दिया वहीं डाकू खड्ग सिंह व गौरी यादव को जेल के सींकचों के पीछे पहुंचा दिया। जिला पुलिस की कार्यशैली से दबंग और डकैत तो नहीं लेकिन आम जनमानस जरूर दहशत में हैं जहां थाने और चौकियां तक बिकने के आरोप लगते रहे हैं। समाज विरोधी तत्वों के सिर्फ इस जिले में बहाव की बात करें तो ऐसा कोई जरायम का पन्ना नही जिसके अध्याय यहां पर लिखे न जाते हों। विश्व प्रसिद्ध धार्मिक आस्था के इस केंद्र में कच्ची शराब, स्मैक और गांजा तो बिकता ही है और अंग्रेजी शराब हर लाज व होटल के पास आसानी से अतिरिक्त दाम चुका कर मिल जाती है। नव धनाढ्य वर्ग के लिए यहां होटलों में हर एक 'वस्तु' आसानी से सुलभ है। इस चौकी में कमाई का सबसे बड़ा श्रोत डग्गामारी है। इसके साथ ही प्रत्येक अमावस्या में बाहर से आने वाले गिरहकट भी पुलिस को पूरा सहयोग करते हैं। वैसे पुलिस के काफी लोगों के पास खुद की गाडि़यों से डग्गामारी करवाते हैं। जिससे उन्हें मासिक शुल्क नही देना पड़ता। बड़ी अमावस्या पर तो ठेके पर बाहर से टैक्सियां व आपे चलवाने वालों में भी पुलिस विभाग से जुड़े लोगों के नाम आते रहे हैं। आय के श्रोत वाले भरतकूप, बरगढ़ मऊ व पहाड़ी राजापुर में पत्थर व बालू से पुलिस को आमदनी है तो मारकुंडी, बहिलपुरवा और मानिकपुर में लकड़ी से। इसके साथ ही रेलवे पुलिस का काम भी हमेशा से संदिग्धता की श्रेणी में रहा है। वह रेलवे का माल बचाने में कम बिना टिकट यात्रियों की चेकिंग के साथ सीटें बेचने और सामान्य यात्रियों को परेशान कर धन वसूलने में ज्यादा ध्यान देती है। इस पूरे मामले पर मा‌र्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के जिला सचिव रुद्रप्रसाद मिश्र कहते हैं कि एक भी दिन ऐसा नही जाता जब पुलिस पर आरोपित मामले उनके पास न आते हों। कई मामलों को वे कोर्ट में ले गये। जिस पर बाकायदा मुकदमा चला और कई पुलिस कर्मियों को सजा मिली। अभी भी यहां की अदालतों में कई पुलिस कर्मियों के खिलाफ मामले चल रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज की जिला पुलिस अपराधियों को पकड़ने में कम खुद अपराधियों को संरक्षण देने में ज्यादा रुचि रखती है। कुल मिलाकर जब तक जिले की पुलिस का चेहरा नहीं बदला जायेगा तब तक शायद यूं ही धर्मनगरी के बीहड़ों में ददुआ, ठोकिया और नान केवट पैदा होते रहेंगे और यहां की वादियां बंदूकों की गरज से गूंजती और बेकसूरों के खून से होली खेलती रहेंगी।

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