रविवार, 21 जून 2009

नही जला मकान तो भोजन नही

Jun 21, 02:45 am
चित्रकूट। यह तो नाइंसाफी है। हमारा घर नही जला तो क्या जब खाने पीने के सामन के साथ पैसे भी लूट लिये गये तो क्या खायें।
खाना तो केवल उन्हीं को मिल रहा है जिनके घर बचे ही नही, जबकि खाने की जरूरत तो पूरे गांव को है। एक निषाद परिवार का कुनवा इतना बढ़ा कि उसने एक छोटे से गांव की शक्ल ले ली। राजस्व विभाग के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि गांव के 57 घर पूरी तरह जल गये है। जबकि किनारे के सात मकान पूरी तरह बच गये। साथ ही 3 मकान आंशिक रूप से जले हैं। साबुत मकान बचने वाले गुलजार, राजाराम, रामन, राजकरन, गोरे, रज्जन और तेज बहादुर के लिये सरकारी इमदाद के नाम पर कुछ नही है।
पचासों जवानों के छिपने की स्थली बना रहा गुलजार का मकान तो साबुत बच गया, पर उसके कटहल के पेड़ का एक भी फल साबुत नही बचा। सब आसपास के गांव वाले व पीएसी के जवान उठा ले गये। उनकी बहू रन्नो बताती है कि पुलिस ने उन्हें संभलने का मौका ही नही दिया जैसी हालत में थे वैसे ही घर से निकल जाने का हुक्म सुना दिया। क्या करते जब घर से पैसा रुपया या सामान ही देखने का मौका नही दिया तो फिर क्या किया जाये। घर में उसके पति की जेब का पैसा साफ हो जाने की उसने बात कही। कहा कि पिछले दो दिनों से रिश्तेदारों के भरोसे ही उसका घर चल रहा है। गांव की तबाही का मंजर सुनकर गांव में आ रहे रिश्तेदार अपने साथ खाने पीने का जो सामान ला रहे हैं उसी में गुजर बसर हो रहा है।
तो अब क्या होगा..
अधिकतर ग्रामीणों को इस बात का डर सता रहा है कि अभी तो नया-नया मामला है तो सरकारी इमदाद के नाम पर भोजन मिल रहा है। खेत पर भगवान इन्द्र की कृपा न होने कारण अभी कुछ बोया नही गया। पहले का रखा सभी कुछ जल कर स्वाहा हो गया। आगे की जिंदगी लगाता है दूसरे की मजदूरी करके ही गुजारनी पड़ेगी। सबसे बड़ी दिक्कत तो बिट्टन को इस बात की है कि उसके जानवरों का क्या होगा क्योंकि अधिकतर गांव में रखा भूषा जल चुका है और उनके खाने के लिये भी कुछ नही बचा है।

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