मंगलवार, 23 जून 2009

न कोई बंकर और न था कहीं घोड़ा

Jun 23, 11:37 am
चित्रकूट। डाकू घनश्याम केवट के कारण चर्चा में आये जमौली गांव के लोग आज भी आंख में आंसू लिये हर एक से सवाल पूछते हैं कि भइया हमारा कसूर क्या है। बच्चे के जन्म में खुशियां मनाना गलत होता है क्या। अब जब बीहड़ में रहेंगे तो हमारे लिए डाकू क्या और पुलिस क्या, जो भी बंदूक के जोर पर खाना मांगेगा उसे तो देना ही पड़ेगा। अब ऐसे में डाकू का शरणदाता बता उत्पीड़न का भय दिखाया जाना तो गलत ही है।
जमौली गांव के श्याम सुन्दर, राम राज, फूलचंद्र, जगन्नाथ, रामजस , महेश, बाबू लाल, भैंरोदीन व महावीर आदि दर्जनों लोग कहते हैं कि गांव में कोहराम मचा था। डाकू को निकालने के लिए उनकी आंखों के सामने पूरा गांव जला दिया गया और अब यह बदनामी कि गांव वाले डाकू को शरण देते थे। उन्होंने बताया कि गांव के मकान अन्य गांवों जैसे ही साधारण बने हैं। एक दूसरे मकान से न कोई मकान जुड़ा है और न ही किसी मकान के अंदर गड्ढा या बंकर है। उन्होंने बताया कि गांव के लोगों को जातिगत कारणों से डाकू को पनाह देना भी गलत है। गांव के मकानों के अंदर बंकर और डाकू के भागने के स्थान से कुछ दूरी पर घोड़ा होने की बात को तो पुलिस उपाधीक्षक नगर आलोक जायसवाल ने भी सिरे से नकार दिया। कहा कि चंबल के डाकुओं के पास कभी घोड़े हुआ करते थे। फिर डाकू घनश्याम का पारिवारिक ऐसा परिवेश भी नही है कि उसके पास कभी घोड़ा रहा हो तो फिर उसकी सहायता करने के लिए घोड़ा कहां से आया। उधर मुठभेड़ के समय किसकी हिम्मत थी कि वह अपनी जान जोखिम में डाल डाकू की मदद करने आयेगा। एसटीएफ के दर्जनों जवान जिन्होंने लगातार तीस घंटों तक दस्यु नान को मारने के लिए अथक परिश्रम किया बताते हैं कि न तो डाकू के मरने के बाद कोई मोबाइल मिला और न ही सर्विलांस पर ऐसा कुछ देखा गया। बंकर, घोड़ा और मोबाइल का उपयोग करने वाली बातें गलत हैं।

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